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सुमन सौरभ : जब किशोरों के लिए पत्रिका निकालना सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक जिम्मेदारी थी (Suman Saurabh: The Youth Magazine That Took Teenagers Seriously)

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सुमन सौरभ की कहानी केवल एक पुरानी पत्रिका की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की है जब किशोर पाठकों के लिए ज्ञान, मनोरंजन और जीवन से जुड़े सवालों को एक ही मंच पर जगह मिलती थी। (More than an old Hindi magazine, Suman Saurabh represented an era when teenage readers were given stories, knowledge, career guidance, entertainment and space to understand the world around them.)

हिंदी पत्रिकाओं का इतिहास केवल कागज, छपाई और प्रसार संख्या का इतिहास नहीं है। यह उन बदलती पीढ़ियों का इतिहास भी है, जिन्हें इन पत्रिकाओं ने पढ़ना सिखाया, दुनिया को देखने का नजरिया दिया और कई बार ऐसे सवालों से परिचित कराया जिनके बारे में घर या विद्यालय में बातचीत की गुंजाइश बहुत कम होती थी। खासकर बच्चों और किशोरों के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं ने भारतीय समाज में एक ऐसी भूमिका निभाई, जिसका महत्व आज पीछे मुड़कर देखने पर कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

Suman Saurabh - Youth Magazine - October 2001
Suman Saurabh – Youth Magazine – October 2001
Jasoosi Visheshank

इसी परंपरा में सुमन सौरभ (Suman Saurabh) पत्रिका का नाम विशेष ध्यान खींचता है। दिल्ली प्रेस ने 1983 में इस पत्रिका की शुरुआत की थी। भारतीय राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय से संबद्ध इन्फ्लिबनेट के पत्रिका अभिलेख में इसका प्रकाशन वर्ष 1983, प्रकाशक दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन लिमिटेड और मासिक प्रकाशन का उल्लेख मिलता है। उसी अभिलेख में इसकी सामग्री को 11 से 18 वर्ष की आयु के पाठकों के लिए कहानियों, ज्ञानवर्धक लेखों और नियमित स्तंभों का मिश्रण बताया गया है।

यह विवरण छोटा है, लेकिन सुमन सौरभ को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। क्योंकि 11 से 18 वर्ष की उम्र को केवल ‘बच्चों’ की श्रेणी में रख देना आसान है, मगर वास्तव में यही वह उम्र है जब व्यक्ति पहली बार अपने आसपास की दुनिया को अपने माता-पिता और शिक्षकों की आंखों से अलग करके देखना शुरू करता है। उसके भीतर अपनी पसंद बनती है, असहमति जन्म लेती है, भविष्य को लेकर प्रश्न उठते हैं और वह यह समझने की कोशिश करता है कि आखिर वह स्वयं किस तरह का इंसान बनना चाहता है।

सुमन सौरभ ने इसी उम्र को अपना पाठक माना था।

उस समय की दुनिया और एक नई तरह के पाठक की जरूरत

1983 का भारत आज के भारत से बहुत अलग था। घर-घर इंटरनेट नहीं था, मोबाइल फोन की कल्पना आम आदमी की पहुंच से बाहर थी और किसी विषय पर तुरंत जानकारी पाने के लिए कोई खोजयंत्र उपलब्ध नहीं था। किसी किशोर के सामने दुनिया को समझने के साधन सीमित थे। पुस्तकालय, किताबें, अखबार, रेडियो, दूरदर्शन और पत्रिकाएं ही उसके बड़े माध्यम थे।

इस वातावरण में किसी पत्रिका का संपादक यह तय करता था कि उसके पाठक को अगले महीने क्या पढ़ने को मिलेगा। इसलिए पत्रिका केवल सामग्री का संग्रह नहीं होती थी; उसमें संपादकीय चयन की एक स्पष्ट भूमिका होती थी। पाठक को क्या बताया जाए, किस भाषा में बताया जाए, किस विषय को कितना महत्व दिया जाए और किस विषय को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया जाए। इन सभी फैसलों का असर उस पीढ़ी की सोच पर पड़ता था।

Suman Saurabh - Youth Magazine - August 2001
Suman Saurabh – Youth Magazine – August 2001
Videshi Siksha Visheshank

सुमन सौरभ का जन्म इसी पत्रिका संस्कृति के दौर में हुआ।

दिल्ली प्रेस का अपना इतिहास भी इस संदर्भ को समझने में मदद करता है। प्रकाशन समूह की स्थापना 1939 में हुई थी और समय के साथ उसने सरिता, चंपक, गृहशोभा, वुमन्स एरा, सरस सलिल और सुमन सौरभ जैसी अलग-अलग पाठक वर्ग वाली पत्रिकाएं प्रकाशित कीं। कंपनी आज भी सुमन सौरभ को अपने प्रकाशनों में युवा और किशोर पाठकों के लिए पत्रिका के रूप में सूचीबद्ध करती है।

इसलिए सुमन सौरभ को अचानक पैदा हुई कोई अकेली पत्रिका समझना उचित नहीं होगा। वह उस प्रकाशन परंपरा की उपज थी जिसमें पाठक की उम्र, रुचि और जीवन की अवस्था को ध्यान में रखकर अलग-अलग पत्रिकाएं तैयार की जाती थीं।

किशोर को आखिर चाहिए क्या?

यही वह प्रश्न है जिसने सुमन सौरभ को दूसरी बाल पत्रिकाओं से अलग पहचान दी।

छोटे बच्चे के लिए कहानी, चित्र, पहेली और मनोरंजन पर्याप्त हो सकते हैं। लेकिन किशोर की दुनिया इतनी सरल नहीं रहती। वह जानना चाहता है कि दुनिया में क्या हो रहा है। उसे विज्ञान में रुचि हो सकती है, खेल में उत्साह हो सकता है, किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के जीवन के बारे में पढ़ने की इच्छा हो सकती है और उसी समय उसे अपने भविष्य को लेकर चिंता भी हो सकती है।

सुमन सौरभ की विषय वस्तु इसी व्यापक दुनिया को समेटती थी। दिल्ली प्रेस इसे युवा और किशोर पाठकों की सामान्य रुचि की पत्रिका बताते हुए विज्ञान, जीवनियां तथा अन्य ज्ञानवर्धक विषयों का उल्लेख करता है।

Suman Saurabh - Youth Hindi Magazine - August 2019
Suman Saurabh – Youth Hindi Magazine – August 2019

बाद के उपलब्ध अंकों के विवरण से इसका दायरा और स्पष्ट होता है। मैगज़्टर पर अगस्त 2019 के अंक के परिचय में समसामयिक घटनाओं, जानकारीपरक लेखों, करियर, खेल और मनोरंजन के साथ किशोर जीवन से जुड़े रिश्ते, पहनावा, बदलते चलन, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत समस्याओं जैसे विषयों का उल्लेख है। पत्रिका स्वयं को ऐसा माध्यम बताती है जो किशोरों को मित्र और मार्गदर्शक की तरह संबोधित करता है।

यहीं सुमन सौरभ की मूल संपादकीय सोच दिखाई देती है। वह किशोर को केवल कहानी पढ़ने वाला बच्चा नहीं मानती थी। वह उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखती थी जिसके भीतर जिज्ञासा है, असुरक्षा है, महत्वाकांक्षा है और अपने आसपास की दुनिया को समझने की इच्छा भी है।

आज हमें यह बात सामान्य लग सकती है, लेकिन उस समय किशोरों के लिए हिंदी में ऐसी व्यापक सामग्री उपलब्ध कराना अपने आप में महत्वपूर्ण प्रयोग था।

मनोरंजन और ज्ञान के बीच की वह जगह

पुरानी पत्रिकाओं की एक खासियत थी कि वे विषयों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखती थीं। एक ही अंक में कहानी के बाद विज्ञान का लेख मिल सकता था, फिर किसी महान व्यक्तित्व की जीवनी, उसके बाद कोई रोचक तथ्य और फिर ऐसा लेख जो पाठक की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ता हो।

इस तरह पढ़ने वाला अनजाने में कई तरह की सामग्री से परिचित होता था।

Suman Saurabh - Youth Hindi Magazine - August 2018
Suman Saurabh – Youth Hindi Magazine – August 2018

आज हम इसे ‘बहुविषयक सामग्री’ कह सकते हैं, लेकिन उस समय इसके लिए कोई आकर्षक शब्दावली आवश्यक नहीं थी। यह बस एक अच्छी पत्रिका की पहचान थी।

सुमन सौरभ का महत्व इसी जगह समझ में आता है। वह किशोर को किसी एक खांचे में बंद नहीं करती थी। पाठक विज्ञान पढ़ सकता था, खेल के बारे में जान सकता था, मनोरंजन से जुड़ी सामग्री पढ़ सकता था और फिर किसी सामाजिक या व्यक्तिगत प्रश्न पर विचार कर सकता था।

एक तरह से यह उस उम्र के लिए एक छोटी सी दुनिया तैयार करती थी जिसमें किशोर अपने आसपास के संसार की अलग-अलग झलकियां देख सकता था।

‘समझाने’ के बजाय ‘बात करने’ की जरूरत

किशोरों के साथ संवाद करना हमेशा आसान नहीं रहा है। वयस्क दुनिया अक्सर उन्हें या तो बहुत छोटा समझती है या उनसे अचानक बहुत परिपक्व व्यवहार की उम्मीद करने लगती है। दोनों स्थितियों में किशोर के वास्तविक प्रश्न कहीं बीच में छूट जाते हैं।

सुमन सौरभ के उपलब्ध विवरण में उसे किशोरों की भूमिका और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करने वाली तथा मित्र और मार्गदर्शक की तरह उनसे संवाद करने वाली पत्रिका बताया गया है। इसके विषयों में व्यक्तिगत समस्याओं और रिश्तों जैसे क्षेत्र भी शामिल थे।

Suman Saurabh - Youth Hindi Magazine - August 2015
Suman Saurabh – Youth Hindi Magazine – August 2015

यह पहलू आज विशेष रूप से दिलचस्प लगता है। इंटरनेट से पहले के समय में यदि किसी किशोर के मन में कोई ऐसा सवाल था जिसे वह माता-पिता से पूछने में झिझकता था, तो उसके पास बहुत सीमित विकल्प थे। किसी विश्वसनीय पुस्तक या पत्रिका में उस विषय पर संतुलित सामग्री मिल जाना इसलिए बहुत मायने रखता था।

आज स्थिति उलट गई है। जानकारी की कमी नहीं है; बल्कि इतनी अधिक जानकारी है कि सही और गलत के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। कुछ सेकंड में किसी भी सवाल का उत्तर सामने आ जाता है, लेकिन उत्तर के साथ संदर्भ, विश्वसनीयता और जिम्मेदार मार्गदर्शन हमेशा नहीं मिलता।

यहीं पुरानी पत्रिका संस्कृति की एक अनदेखी खूबी सामने आती है की उसमें किसी विषय तक पहुंचने से पहले एक संपादक की जिम्मेदारी काम कर रही होती थी।

आज के किशोर के पास सब कुछ है, फिर भी कुछ कमी है

यहां सुमन सौरभ की चर्चा केवल पुरानी यादों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

आज किशोरों के पास पहले से कहीं अधिक साधन हैं। मोबाइल फोन ने दुनिया को उनकी हथेली में ला दिया है। वीडियो, सामाजिक माध्यम, खेल, वेब श्रृंखलाएं, इंटरनेट और अनेक डिजिटल मंच हर समय नई सामग्री उपलब्ध कराते हैं। कोई भी बच्चा या किशोर किसी विषय पर कुछ ही मिनट में ऐसी जानकारी हासिल कर सकता है, जिसके लिए पहले उसे कई किताबें खंगालनी पड़तीं।

फिर भी एक अजीब सी कमी महसूस होती है।

हमारे पास सामग्री बहुत है, लेकिन संपादित और विचारपूर्वक तैयार की गई सामग्री का अनुपात उतना नहीं है। हर चीज को जल्दी देखने, जल्दी समझने और अगले विषय पर पहुंच जाने की आदत बढ़ती जा रही है। किशोरों के लिए तैयार होने वाली बहुत सी डिजिटल सामग्री उनकी जिज्ञासा को समझने के बजाय उनका ध्यान कुछ सेकंड के लिए रोकने की कोशिश करती है।

यही फर्क महत्वपूर्ण है।

Suman Saurabh - Youth Hindi Magazine
Suman Saurabh – Youth Hindi Magazine

एक अच्छी पत्रिका पाठक के समय को भरने के लिए नहीं निकलती थी। वह चाहती थी कि पाठक कुछ पढ़े, उसके बारे में सोचे और अगली बार जब उसी विषय से सामना हो तो उसे थोड़ा अधिक समझ हो।

आज का डिजिटल संसार मुख्यतः ध्यान खींचने की अर्थव्यवस्था पर चलता है। जितनी देर पाठक स्क्रीन पर रहे, उतना अच्छा। इस व्यवस्था में गंभीरता, विस्तार और धैर्य अक्सर सबसे पहले बलि चढ़ते हैं।

इसीलिए सुमन सौरभ जैसे प्रकाशन को आज फिर से पढ़ना केवल अतीत में लौटना नहीं है। यह पूछना भी है कि क्या हमने किशोरों को अधिक जानकारी तो दी है, लेकिन उनके लिए सोचने की जगह कम कर दी है?

पत्रिका के पृष्ठों से बनता था पाठक

पुराने समय की पत्रिकाओं की एक और भूमिका थी, जिसे आज की पीढ़ी शायद पूरी तरह महसूस नहीं कर सकती। वे पढ़ने की आदत बनाती थीं।

हर महीने पत्रिका आने का इंतजार होता था। अंक खरीदा जाता था, घर में रखा जाता था, किसी दूसरे सदस्य के हाथ में जाता था और फिर वापस अपनी जगह लौटता था। कुछ लेख दोबारा पढ़े जाते थे। कुछ चित्र काटकर रख लिए जाते थे। किसी कहानी का पात्र लंबे समय तक याद रहता था।

Suman Saurabh - Youth Hindi Magazine - April 2019
Suman Saurabh – Youth Hindi Magazine – April 2019

यह पूरी प्रक्रिया पाठक और प्रकाशन के बीच एक रिश्ता बनाती थी। “धारावाहिक कहानी” का अर्थ भी सुमन सौरभ पत्रिका के माध्यम से समझ आया था जहां कहानी किसी उपन्यास के भांति खंड-खंड में प्रकाशित होती थीं।

आज सदस्यता एक क्लिक में हो जाती है और सामग्री एक स्वाइप में बदल जाती है। सुविधा निश्चित रूप से बढ़ी है, लेकिन उस पुराने रिश्ते का स्वरूप बदल गया है।

सुमन सौरभ की असली विरासत शायद इसी पाठकीय संबंध में थी। उसने अपने पाठक को केवल ग्राहक नहीं माना; वह उसे अपनी अगली पीढ़ी के रूप में देखती थी।

सुमन सौरभ का वर्तमान: एक जरूरी सावधानी

सुमन सौरभ के वर्तमान प्रकाशन को लेकर थोड़ी सावधानी आवश्यक है। दिल्ली प्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर पत्रिका आज भी उसके प्रकाशनों की सूची में मौजूद है और उसे युवा तथा किशोर पाठकों की पत्रिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लेकिन डिजिटल अभिलेखों में स्थिति उतनी स्पष्ट नहीं है। मैगज़्टर पर उपलब्ध सूची में अगस्त 2019 का अंक दिखाई देता है और उसके साथ 2019 के पिछले अंक भी सूचीबद्ध हैं। दूसरी ओर, इन्फ्लिबनेट का अभिलेख इसका प्रकाशन क्रम 1983 से दर्ज करता है, लेकिन वर्तमान संस्थागत उपलब्धता के लिए कोई सक्रिय ई-पत्रिका संग्रह नहीं दिखाता।

इसलिए 2026 में यह कहना कि सुमन सौरभ निश्चित रूप से पहले की तरह नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है, उपलब्ध स्वतंत्र स्रोतों के आधार पर उचित नहीं होगा। हां, इतना जरूर है कि दिल्ली प्रेस की वर्तमान वेबसाइट पर उसका नाम अब भी कायम है। यह अपने आप में इस पत्रिका की लंबी यात्रा का दिलचस्प संकेत है।

उस दौर की पत्रिकाएं और आज का खालीपन

सुमन सौरभ को उसके समय की दूसरी बाल और किशोर पत्रिकाओं से अलग करके देखना भी सही नहीं होगा। हिंदी में बच्चों के लिए पत्रिकाओं की एक मजबूत परंपरा रही है। कई प्रकाशनों ने साहित्य, विज्ञान, इतिहास, पहेलियों, चित्रकथाओं और सामान्य ज्ञान के माध्यम से बच्चों की दुनिया को समृद्ध किया।

Suman Saurabh - Youth Hindi Magazine - June 2017
Suman Saurabh – Youth Hindi Magazine – June 2017

लेकिन समय के साथ इस परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। काॅमिक्स बाइट के पूर्व प्रकाशित बाल पत्रिकाओं के इतिहास पर एक लेख में सुमन सौरभ का उल्लेख मिलता है और वो आगे चलकर कई अन्य बाल पत्रिकाओं के बंद होने तथा समाचार पत्रों के रविवार के साहित्यिक परिशिष्टों में कमी आने की ओर भी संकेत करता है। लेख में इस बदलाव को बाल साहित्य के पाठकों के लिए नुकसान के रूप में देखा गया है।

यह समस्या केवल बाल साहित्य की नहीं है। असल समस्या उस व्यापक संपादकीय संस्कृति के कमजोर होने की है जिसमें पाठक की उम्र और मानसिक अवस्था को ध्यान में रखकर सामग्री तैयार की जाती थी।

आज बच्चों और किशोरों के लिए सामग्री जरूर बन रही है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा या तो बहुत छोटों के लिए है या फिर सीधे वयस्क लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन जाता है। 12 से 18 वर्ष की वह जटिल दुनिया, जिसमें व्यक्ति न तो बच्चा रह गया है और न पूरी तरह वयस्क बना है, उसके लिए गंभीर और रोचक भारतीय भाषा का प्रकाशन अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

यही वह खाली जगह है जिसकी ओर सुमन सौरभ की कहानी हमें दोबारा देखने के लिए मजबूर करती है।

अगर सुमन सौरभ आज फिर से शुरू हो…

आज वही पत्रिका उसी रूप में शुरू नहीं की जा सकती। समय बदल चुका है और पाठक भी। केवल पुराने ढंग की कहानियां, सामान्य ज्ञान और कुछ सलाह देकर किसी किशोर को लंबे समय तक जोड़े रखना संभव नहीं होगा।

लेकिन उसकी मूल सोच आज भी बेहद उपयोगी हो सकती है।

Suman Saurabh Patrika
Suman Saurabh Patrika

आज के सुमन सौरभ को कृत्रिम रूप से आधुनिक दिखने के लिए हर दूसरे पन्ने पर अंग्रेज़ी शब्दों और चमकदार चित्रों की जरूरत नहीं होगी। उसे बस अपने पाठक को गंभीरता से लेना होगा।

वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बदलते रोजगार संसार पर बात कर सकती है। सामाजिक माध्यमों के प्रभाव को समझा सकती है। विज्ञान और अंतरिक्ष को रोचक तरीके से प्रस्तुत कर सकती है। मानसिक दबाव, परीक्षा, मित्रता और परिवार जैसे विषयों पर विशेषज्ञों के साथ बातचीत कर सकती है। खेल, सिनेमा, संगीत, कॉमिक्स और लोकप्रिय संस्कृति को केवल मनोरंजन मानने के बजाय उनके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव पर भी चर्चा कर सकती है।

और सबसे महत्वपूर्ण, उसमें किशोरों की अपनी आवाज होनी चाहिए।

आज का किशोर केवल किसी बड़े व्यक्ति से सलाह सुनना नहीं चाहता। वह यह भी चाहता है कि कोई उसकी बात सुने।

शायद यही वह बिंदु है जहां सुमन सौरभ की पुरानी संपादकीय भावना आज के समय में फिर प्रासंगिक हो सकती है।

अंत में एक सवाल

सुमन सौरभ की कहानी पढ़ते हुए मुझे सबसे अधिक महत्वपूर्ण उसका प्रकाशन वर्ष नहीं लगता, न ही उसके किसी विशेष अंक की विषय सूची। अधिक महत्वपूर्ण यह विचार है कि चार दशक से भी पहले एक प्रकाशन समूह ने यह समझा था कि किशोरों के लिए अलग तरह की पत्रिका की जरूरत है और एक ऐसी पत्रिका जो उन्हें बच्चा मानकर केवल मनोरंजन न परोसे और न ही अचानक वयस्कों की दुनिया में धकेल दे।

वह उनके साथ बातचीत करे, उन्हें दुनिया से परिचित कराए और धीरे-धीरे उन्हें अपने विचार बनाने की क्षमता दे।

Suman Saurabh Patrika
Suman Saurabh Patrika

आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक माध्यम हैं। हमारे पास तेज तकनीक है, विशाल सूचना भंडार है और हर विषय पर तत्काल सामग्री उपलब्ध है। इसके बावजूद यदि कोई किशोर अपने सवालों के बीच अकेला महसूस करता है, तो हमें यह सोचने की जरूरत है कि कमी आखिर कहां है।

शायद कमी सामग्री की नहीं, संपादकीय संवेदना की है।

शायद कमी जानकारी की नहीं, विश्वसनीय मार्गदर्शन की है।

और शायद सबसे बड़ी कमी उस संवाद की है जिसमें किसी किशोर से यह मानकर बात की जाए कि वह केवल भविष्य का वयस्क नहीं, बल्कि आज का अपना एक स्वतंत्र पाठक है।

सुमन सौरभ की सबसे बड़ी विरासत इसी विचार में दिखाई देती है।

उसके पुराने पृष्ठ हमें केवल यह याद नहीं दिलाते कि हम क्या पढ़ा करते थे। वे यह सवाल भी सामने रखते हैं कि आज के किशोर के हाथ में ऐसी कौन सी पत्रिका है जिसे वह दस साल बाद खोलकर अपने समय की याद के रूप में पढ़ सके?

अगर इस सवाल का उत्तर हमारे पास नहीं है, तो सुमन सौरभ को याद करने की सबसे अच्छी वजह शायद यही है कि वह हमें एक ऐसी चीज की कमी का एहसास कराती है, जिसकी हमें आज भी जरूरत है। एक ऐसी पत्रिका, जो युवा पाठक को केवल व्यस्त न रखे, बल्कि उसे थोड़ा बेहतर पाठक, थोड़ा जिज्ञासु इंसान और अंततः अपने समय को समझने वाला नागरिक बनाए।

और यही किसी भी युवा पत्रिका की असली सफलता हो सकती है। आभार – काॅमिक्स बाइट!!

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