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1990 का डायमंड कॉमिक्स विज्ञापन: चाचा चौधरी और भारतीय कॉमिक्स का सुनहरा दौर। (1990 Diamond Comics Advertisement: Chacha Chaudhary and the Golden Era of Indian Comics)

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1990 के बाल भारती अंक में प्रकाशित डायमंड कॉमिक्स का यह दुर्लभ विज्ञापन चाचा चौधरी, बिल्लू और पिंकी जैसे लोकप्रिय किरदारों के उस दौर की याद दिलाता है, जब भारतीय कॉमिक्स बच्चों की दुनिया का अहम हिस्सा हुआ करती थीं। (A vintage 1990 Diamond Comics advertisement featuring Chacha Chaudhary, Billoo and Pinki, a nostalgic glimpse into the golden era of Indian comics.)

कुछ तस्वीरें पुरानी होती हैं, लेकिन उनकी यादें कभी पुरानी नहीं होतीं।

जैसे किसी पुराने कॉमिक्स कवर की झलक, किसी पत्रिका में छपा विज्ञापन या किसी भूली-बिसरी कॉमिक का नाम! उसे देखते ही आँखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और अचानक हम कई दशक पीछे पहुँच जाते हैं। हमारे सामने मौजूद 1990 का डायमंड कॉमिक्स विज्ञापन यह विज्ञापन एक ऐसी ही एक नौस्टलैजिक टाइम मशीन है।

Diamond Comics Vintage Ad Series - Bal Bharti
Chacha Chaudhary Aur Ek Karod Ka Heera
Diamond Comics Vintage Ad Series – Bal Bharti
Chacha Chaudhary Aur Ek Karod Ka Heera

बाल भारती के मार्च 1990 अंक में प्रकाशित यह विज्ञापन उस दौर की डायमंड कॉमिक्स की दुनिया की शानदार झलक देता है। एक ही पन्ने पर चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू और पिंकी दिखाई देते हैं और साथ में उनके कई कॉमिक्स शीर्षकों की लंबी सूची भी दी गई है।

लेकिन इस विज्ञापन की सबसे पहली नजर में पकड़ने वाली चीज है –

चाचा चौधरी।

पढें: विंटेज डायमंड कॉमिक्स विज्ञापन: चाचा चौधरी से लेकर अग्निपुत्र अभय और डायनामाइट तक। (Vintage Diamond Comics Ad: From Chacha Chaudhary to Agniputra Abhay and Dynamite)

चाचा चौधरी और एक करोड़ का हीरा

विज्ञापन के ऊपरी हिस्से में “चाचा चौधरी और एक करोड़ का हीरा” का आवरण प्रमुखता से दिखाया गया है।

एक नजर में ही यह कवर उस दौर की कॉमिक्स स्टोरीटेलिंग की पहचान सामने रख देता है रहस्य, अपराध, हास्य और चाचा चौधरी की चतुराई।

चाचा चौधरी की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे पारंपरिक अर्थों में कोई दूर की दुनिया से आया सुपरहीरो नहीं थे। वे हमारे अपने थे।

Diamond Comics - Chacha Chaudhary Aur Ek Karod Ka Heera
Diamond Comics – Chacha Chaudhary Aur Ek Karod Ka Heera

उनकी दुनिया में मोहल्ले थे, बाजार थे, पुलिस थी, चोर थे, दोस्त थे और रोजमर्रा की जिंदगी के बीच पैदा होने वाली असाधारण परिस्थितियाँ थीं।

और जब मामला हाथ से निकलने लगता था, तब साबू मौजूद था।

चाचा चौधरी का दिमाग और साबू की ताकत, यही जोड़ी भारतीय कॉमिक्स संस्कृति की सबसे यादगार जोड़ियों में से एक बन गई।

“कार्टूनिस्ट प्राण के प्रसिद्ध चरित्र”

विज्ञापन में एक खास लाइन लिखी है:

“कार्टूनिस्ट प्राण के प्रसिद्ध चरित्र”

इसके नीचे और आसपास हमें प्राण के बनाए कई लोकप्रिय किरदारों की दुनिया दिखाई देती है। यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है।

आज के दौर में जब किसी कैरेक्टर को लोकप्रिय बनाने के लिए फिल्मों, स्ट्रीमिंग शोज, मर्चेंटडाईजिंग और सोशल मीडिया कैंपेन की जरूरत पड़ती है, उस दौर में सिर्फ कॉमिक्स और पत्रिकाओं के पन्ने ही इन किरदारों को लाखों पाठकों तक पहुँचा रहे थे।

चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू और पिंकी ने इसी माध्यम से अपनी जगह बनाई।

बिल्लू: क्रिकेट, शरारत और मोहल्ले की दुनिया

विज्ञापन के बीचोंबीच “Billoo’s Other Comics” की एक लंबी सूची दी गई है।

इसमें Billoo’s Elephant Ride, Billoo & Film Show, Billoo in Hostel, Billoo & Home Work, Billoo on Picnic और कई अन्य शीर्षक दिखाई देते हैं।

Diamond Comics - Billoo Aur Hanthi Ki Sair
Diamond Comics – Billoo Aur Hanthi Ki Sair

बिल्लू की खासियत यह थी कि उसकी दुनिया किसी काल्पनिक ग्रह या सुपरहीरो हैडक्वाटर्स में नहीं थी। वह स्कूल, घर, दोस्त, खेल और शरारतों की दुनिया थी। यही कारण है कि बिल्लू का पात्र भारतीय बच्चों को इतना अपना लगा।

उसके कहानी में अतरंगी चीजें होती थीं, लेकिन उनका आधार हमेशा हमारी रोजमर्रा की दुनिया होती थी।

पिंकी: छोटी सी बच्ची, बड़ी-बड़ी शरारतें

फिर आती है पिंकी।

विज्ञापन के दाईं ओर “Pinki’s Other Comics” के अंतर्गत कई शीर्षक दिए गए हैं—Pinki & Parents, Pinki & The Juggler, Pinki & Bengali Sweets, Pinki & Joker, Pinki & Two-in-One सहित कई अन्य कॉमिक्स।

Diamond Comics - Pinki Aur Kundanlal Pagdiwala
Diamond Comics – Pinki Aur Kundanlal Pagdiwala

पिंकी की दुनिया चाचा चौधरी के मुकाबले ज्यादा मासूम लग सकती थी, लेकिन उसकी शरारतें कम नहीं थीं। यही प्राण साहब के पात्रों की खूबी थी। हर कैरेक्टर की अपनी पर्सनैलिटी थी।

चाचा चौधरी समझदार थे। साबू ताकतवर था। बिल्लू शरारती और युवा था और पिंकी अपनी मासूमियत के भीतर एक अलग ही अफरा तफरी लेकर चलती थी।

चाचा चौधरी की कॉमिक्स की लंबी सूची

इस पुराने विज्ञापन का शायद सबसे दिलचस्प हिस्सा “Chacha Chaudhary’s Other Comics” है।

यह सूची देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय चाचा चौधरी की कहानियाँ कितनी विविधता के साथ छपती थी।

विज्ञापन में Crown of Yudhishthir, Highway’s Robbers, Encounter with Rakka, Robot, Diamond Field, Rakka’s Vengeance, Hakimji, Sabu in Space, Kidnapping of Sabu, Flying Car, Bank Robbers, Bottle Genie, Sale of Elephant, Return of Rakka, Chacha Chaudhary in America, Cricket Match, Sabu on Darkland, Treasure of Akbar the Great, Cannibals, Karate King और Madam Zaro जैसे शीर्षक नजर आते हैं।

जरा सोचिए। एक ही कैरेक्टर के साथ क्राइम, एडवेंचर, साईंस फिक्शन, मिस्ट्री, हास्य-व्यंग्य और एक्शन का समावेश होता था। यानी आज जिस चीज को हम किसी काॅमिक्स यूनिवर्स कह सकते हैं, उसका एक बेहद देसी और सरल रूप उस समय भारतीय कॉमिक्स में पहले से मौजूद था।

और फिर नजर जाती है उसके मूल्य पर…

विज्ञापन के निचले हिस्से में “मार्च माह के अन्य कॉमिक्स” शीर्षक के अंतर्गत कई अन्य कॉमिक्स के नाम दिए गए हैं। इनमें मामा भांजा और चार मूर्खों की वार्तालाप, फौलादी सिंह और महाविनाश, चिंप्पू और खूनी तस्कर, पिकलू और पिचाश गोरिल्ला तथा अन्य शीर्षक शामिल हैं। अधिकांश की कीमत विज्ञापन में ₹5.00 दी गई है, जबकि “बीरबल की सूझबूझ-I (डाइजेस्ट)” की कीमत ₹12.00 दिखाई देती है।

Diamond Comics - Fauladi Singh Aur Mahavinash
Diamond Comics – Fauladi Singh Aur Mahavinash

आज जब पुराने कॉमिक्स कवर और विज्ञापन कलेक्टर्स के लिए नौस्टलैजिक बन चुके हैं, उस समय की ये कीमतें एक अलग ही कहानी कहती हैं। लेकिन इस विज्ञापन का असली मूल्य उसका पांच रूपये का मुद्रण नहीं है। इसकी असली कीमत इसकी यादों में है।

1990 में कॉमिक्स का मतलब क्या था?

आज जब मनोरंजन हमारी जेब में है। फोन उठाइए और कुछ ही सेकंड में फिल्म, वेब सीरीज़, एनिमेशन या हजारों डिजिटल स्टोरीज़ सामने हैं लेकिन 1990 में कहानी का इंतजार करना पड़ता था, कॉमिक्स की दुकान पर जाना पड़ता था, नया अंक ढूँढना पड़ता था, कवर देखना पड़ता था।

और फिर तय करना पड़ता था —

आज कौन-सी कॉमिक घर जाएगी?

कई बच्चों के लिए कॉमिक्स सिर्फ पढ़ने की चीज नहीं थीं। वे दोस्तों के बीच एक्सचेंज होती थीं। एक कॉमिक कई हाथों से गुजरती थी। कवर याद रहते थे और किरदार भी याद रहते थे।

कई बार हम कहानी का अंत भूल जाया करते थें, लेकिन चाचा चौधरी और साबू का वह कवर याद रह जाता था। विज्ञापन में हिंदी भाषा और अंग्रेजी भाषा दोनों का प्रयोग यह दर्शाता है की डायमंड काॅमिक्स की पहुंच भारत के कोने-कोने में हुआ करती थीं।

दरियागंज से बच्चों की दुनिया तक

विज्ञापन के नीचे डायमंड कॉमिक्स का पता दिया गया है:

डायमंड कॉमिक्स प्रा. लि.
2715, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

आज यह पता इस विंटेज विज्ञापन को और भी प्रमाणिक बना देता है क्योंकि उस समय प्रकाशन और काॅमिक्स की दुनिया पूरी तरह भौतिक थी। कोई ऑनलाइन स्टोर नहीं, कोई सोशल मीडिया एनाउंसमेंट नहीं, कोई यूट्यूब ट्रेलर नहीं और कोई एल्गोरिथम नहीं।

एक अच्छा आवरण और एक आकर्षक विज्ञापन ही पाठक को अगली कॉमिक खरीदने के लिए उत्साहित कर सकता था और इस विज्ञापन ने वही काम किया।

एक पन्ने में पूरा कॉमिक्स ब्रह्मांड

इस विज्ञापन को आज दोबारा देखना इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि यह हमें बताता है कि भारतीय कॉमिक्स संस्कृति कितनी समृद्ध थी।

एक ही पन्ने पर:

चाचा चौधरी।
साबू।
बिल्लू।
पिंकी।
प्राण जी के अन्य पात्र।
डायमंड काॅमिक्स के दर्जनों कॉमिक्स शीर्षक।

यह सिर्फ एक पब्लिकेशन का विज्ञापन नहीं था बल्कि यहाँ बच्चों को बताया जा रहा था की –

अगर तुम्हें यह कहानी पसंद आई है, तो हमारे पास ऐसी और भी बहुत सारी दुनिया हैं।”

और शायद यही किसी सफल प्रकाशक की सबसे बड़ी खूबी होती है। एक कैरेक्टर आपको दूसरी कहानी तक ले जाए, फिर दूसरी कहानी तीसरी तक और देखते ही देखते पूरा कामिक यूनिवर्स आपका अपना बन जाए।

आज भी चाचा चौधरी क्यों याद हैं?

क्योंकि नौस्टलैजिया सिर्फ पुराने समय की याद नहीं है।

यह उस भावनात्मक संबंध का नाम है जो किसी कहानी, किरदार या प्रोडक्ट के साथ बचपन में बनता है। चाचा चौधरी उसी कनेक्शन का एक शानदार उदाहरण हैं।

उनके पास कोई गंभीर या विचित्र ओरिजिन कहानी नहीं थी। उनके पास कोई हथियार नहीं था। लेकिन उनके पास था – ‘दिमाग’, जो कंप्यूटर से भी तेज़ चलता था।

Chacha Chaudhary aur Sabu - Prans
Chacha Chaudhary aur Sabu – Prans

और उनके साथ था जुपिटर वासी महाबलशाली – साबू। यही साधारणता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। दशकों बाद भी जब कोई पुराना चाचा चौधरी कवर सामने आता है, तो कहानी पढ़ने से पहले ही एक पूरा समय याद आ जाता है।

यह विज्ञापन सिर्फ विंटेज नहीं, एक विरासत है

1990 का यह डायमंड कॉमिक्स विज्ञापन आज एक पुराने मैंगजीन पेज की तरह दिखाई देता है लेकिन कामिक बुक प्रशंसकों के लिए यह उससे कहीं ज्यादा है।

यह उस समय का दस्तावेज है जब चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू और पिंकी जैसे भारतीय पात्र बच्चों की कल्पनाशीलता के केंद्र में थे।

जब कॉमिक्स खरीदना एक छोटी-सी खुशी थी। जब एक नए काॅमिक के आने का इंतजार होता था और जब एक साधारण-सा विज्ञापन भी अगले अंक की शुरुआत बन सकता था।

आज हमारे पास दुनिया भर के नायक हैं। फिर भी कभी-कभी दिल उसी पुराने पन्ने पर लौट जाता है।

जहाँ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता था:

“डायमंड कॉमिक्स में…”

और उसके साथ दिखाई देता था —

चाचा चौधरी।

शायद इसलिए कि कुछ किरदार सिर्फ काॅमिक्स में नहीं रहते। वे हमारे-आपके बचपन में रहते हैं। आभार – काॅमिक्स बाइट!!

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Chacha Chaudhary Comics in Hindi (Set of 20 Books)

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