“विमल खन्ना” : रेलवे स्टॉल्स के पल्प फिक्शन से ओटीटी तक, लौट आया सुरेन्द्र मोहन पाठक का सस्पेंस भरा संसार (“Vimal Khanna” : From Railway Stall Pulp Fiction To OTT, The World Of Surender Mohan Pathak Returns)
![]()
किताबों से निकलकर डिजिटल दुनिया में पहुंचा पाठक साहब का सस्पेंस। (Surender Mohan Pathak’s Suspense Enters The Digital Era)
एक समय था जब भारत के लगभग हर रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और लाइब्रेरी में पतली-पतली हिंदी पल्प नॉवेल्स का जादू चलता था। उन्हीं किताबों की दुनिया में एक नाम ऐसा था जिसने करोड़ों पाठकों को रातभर जागकर पढ़ने पर मजबूर किया – “सुरेन्द्र मोहन पाठक”। जी हाँ और अब वर्षों बाद वही दुनिया ओटीटी पर लौट आई है “विमल खन्ना” वेब सीरीज़ के रूप में।

Based On Surendra Mohan Pathak’s Novel
यह सीरीज़ केवल एक नया क्राइम शो नहीं है, बल्कि उस दौर की वापसी का संकेत है जब पाठक साहब की किताबें लोगों के बैग, तकियों और जेबों में हमेशा मौजूद रहती थीं। जिन पाठकों ने “विमल”, “सुनील” और “सुधीर” जैसे किरदारों को पढ़ते हुए अपना युवाकाल बिताया है, उनके लिए यह सीरीज़ एक अलग ही अनुभव बनकर सामने आई है।
कौन है विमल खन्ना?
जो लोग ‘एसएमपी’ यूनिवर्स से परिचित नहीं हैं, उनके लिए बता दें कि “विमल खन्ना” केवल एक नाम नहीं बल्कि एक पहचान है। कहानी में उसका असली नाम ‘सुरेन्द्र सिंह सोहल’ बताया जाता है, जो परिस्थितियों के चलते नई पहचान अपनाने को मजबूर हो जाता है।

Based On Surendra Mohan Pathak’s Novel
वेब सीरीज़ इसी रहस्य, भागदौड़ और सस्पेंस को आधार बनाती है। बिना ज्यादा खुलासा किए इतना कहा जा सकता है कि यह कहानी ऐसे व्यक्ति की है जो सिस्टम, हालात और अपने अतीत, तीनों से लड़ रहा है।

Credits: Surendra Mohan Pathak’s Facebook
सीरीज़ का माहौल पूरी तरह पुराने हिंदी क्राइम नॉवेल्स जैसा महसूस होता है जहां रहस्य, धोखा, डर और लगातार पीछा करती हुई किस्मत जिसने किरदार को झकझोर कर रख दिया है।
“मौत का खेल” से प्रेरित कहानी
बताया जा रहा है कि यह सीरीज़ पाठक साहब के लोकप्रिय उपन्यास “मौत का खेल” से प्रेरित है। हालांकि निर्माताओं ने इसे आधुनिक दर्शकों के हिसाब से थोड़ा नया रूप भी दिया है।

जो लोग पाठक साहब के उपन्यास पढ़ चुके हैं, उन्हें कहानी में कई परिचित भावनाएँ और माहौल महसूस होंगे। वहीं नए दर्शकों के लिए यह एक फ्रेश क्राइम-सर्वाइवल थ्रिलर की तरह काम करती है।
एसएमपी दौर की याद
90s और शुरुआती 2000s में हिंदी पल्प फिक्शन का जो क्रेज था, उसे शब्दों में समझाना मुश्किल है।
रेलवे स्टेशन और बस अड्डों की दुकानों पर:
- विमल सीरीज़
- सुनील सीरीज़
- सुधीर सीरीज़
जेफरी आर्चर और जेम्स हेडली चेज़ के साथ-साथ पाठक जी की किताबें भी साथ बिकती दिखाई देती थीं। कई पाठक अपने पसंदीदा किरदार के हिसाब से किताबें खरीदते थे। किसी को विमल की शांत बुद्धिमानी पसंद थी, किसी को सुनील का अंदाज, तो किसी को सुधीर की दुनिया।
“पैंसठ लाख की डकैती”, “कोलाबा कॉन्सपिरेसी”, “डॉन”, “ब्लैकमेल”, “जुर्म” जैसी किताबों ने पाठकों के भीतर अपराध-कथा पढ़ने की नई आदत पैदा की थी।

इसी वजह से अमेजन प्राईम और एम एक्स प्लेयर पर “विमल खन्ना” का आना केवल एक वेब सीरीज़ रिलीज नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक नॉस्टेल्जिया जैसा महसूस हो रहा है।

सीरीज़ में मुख्य भूमिका निभाई है अभिनेता सन्नी हिंदूजा ने, दर्शकों और समीक्षकों की सबसे ज्यादा तारीफ उनके अभिनय को लेकर देखने को मिल रही है। उन्होंने किरदार को किसी “मास हीरो” की तरह नहीं बल्कि एक थके हुए, डरे हुए और लगातार भागते इंसान की तरह निभाया है। उनकी आंखों और बॉडी लैंग्वेज में लगातार बेचैनी दिखाई देती है और यही चीज किरदार को इसे दूसरे सामान्य थ्रिलर्स से थोड़ा अलग बनाती है।
दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी है?
सीरीज़ को लेकर प्रतिक्रिया फिलहाल मिश्रित लेकिन सकारात्मक कही जा सकती है।
लोगों को क्या पसंद आया?
- पुराना हिंदी पल्प वाला फील
- रहस्य और सर्वाइवल थ्रिलर टोन
- सन्नी हिंदूजा की परफॉर्मेंस
- सुमोपा स्टाइल नैरेशन का असर

क्या कमज़ोर लगा?
कुछ दर्शकों का मानना है कि:
- सीरीज़ और ज्यादा डार्क हो सकती थी
- स्क्रीनप्ले में गहराई थोड़ी कम है
- कुछ हिस्से जल्दबाज़ी में लगते हैं, नाॅवेल्स की तुलना में थोड़ी हल्की।
लेकिन इसके बावजूद ज्यादातर पुराने पाठक इस बात से खुश हैं कि आखिरकार हिंदी पल्प फिक्शन को गंभीरता से ओटीटी पर लाया गया हैं।
कहाँ देख सकते हैं?
“विमल खन्ना” फिलहाल अमेजन एमएक्स प्लेयर पर उपलब्ध है।
क्या यह हिंदी पल्प यूनिवर्स की शुरुआत है?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
अगर “विमल खन्ना” दर्शकों को लंबे समय तक जोड़े रखने में सफल रहती है, तो आने वाले समय में पाठक जी के जासूसी एवं हैरतअंगेज यूनिवर्स के दूसरे किरदारों और कहानियों पर भी वेब सीरीज़ बन सकती हैं।

और सच कहा जाए तो भारतीय दर्शकों को ऐसे ही देसी क्राइम यूनिवर्स की जरूरत भी है जिनकी जड़ें हमारी अपनी पढ़ने की संस्कृति में हों। क्योंकि सुपरहीरो और गैंगस्टर ड्रामा के बीच कहीं न कहीं आज भी वो पाठक मौजूद है…
जो स्टेशन से खरीदी गई एक पल्प नॉवेल में पूरी रात खो जाना चाहता है। आभार – काॅमिक्स बाइट!!

Ek Sees Ka Manava – Autobiography Part-5 by Surender Mohan Pathak (Autobiography Series)



