पी. के. बजाज को श्रद्धांजलि: लोटपोट और मायापुरी के पीछे खड़े दूरदर्शी संपादक को नमन। (P. K. Bajaj: A tribute to the visionary editor behind Lotpot and Mayapuri.)
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लोटपोट और मायापुरी के महान संपादक पी. के. बजाज को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। उन्होंने केवल पत्रिकाएँ नहीं बनाई, उन्होंने पीढ़ियों का बचपन गढ़ा। (Tribute to P. K. Bajaj – the visionary editor behind Lotpot and Mayapuri. His stories, characters and vision shaped the childhood of generations.)

भारतीय कॉमिक्स और बाल पत्रिकाओं की दुनिया के लिए आज का दिन बेहद भावुक है। हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं पी. के. बजाज को, एक ऐसे व्यक्तित्व को जिनकी सोच, मेहनत और दूरदर्शिता ने भारत में बच्चों की पत्रिकाओं और मनोरंजन पत्रकारिता को नई दिशा दी। उनका नाम सुनते ही दो प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ याद आती हैं, एक तो बच्चों की पसंदीदा – लोटपोट और दूसरी है बाॅलीवुड की पसंद – मायापुरी। ये दोनों सिर्फ प्रकाशन नहीं थे, बल्कि भारतीय पाठकों के लिए दशकों तक मनोरंजन और संस्कृति के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे।
आज जब हम उनके जीवन को याद करते हैं तो यह समझना मुश्किल नहीं कि वे केवल एक संपादक या प्रकाशक नहीं थे, वे उन पत्रिकाओं की आत्मा थे।
बचपन की हँसी का नाम “लोटपोट”।
भारत में कॉमिक्स पढ़ने वाली कई पीढ़ियों के लिए लोटपोट केवल एक पत्रिका नहीं थी। यह वह दुनिया थी जहाँ हर अंक में हँसी, रोमांच और सीख छिपी होती थी। इस पत्रिका की शुरुआत 1969 में हुई और तब से यह लगातार प्रकाशित हो रही है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

लोटपोट ने बच्चों को कई यादगार किरदार दिए। इनमें सबसे लोकप्रिय रहे मोटू-पतलू, शेख चिल्ली, नटखट नीटू और चेलाराम, और सबसे खास बात की भारत के सबसे लोकप्रिय कॉमिक्स पात्रों में से एक ‘चाचा चौधरी’ का शुरुआती प्रकाशन भी लोटपोट में ही हुआ था, जिसे बाद में कार्टूनिस्ट प्राण जी ने और आगे विकसित किया। इस तरह लोटपोट ने भारतीय कॉमिक्स इतिहास में कई महत्वपूर्ण किरदारों को जन्म दिया और उन्हें लोकप्रिय बनाया।
परिवार की विरासत और प्रकाशन की यात्रा
लोटपोट और मायापुरी की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि एक पूरे प्रकाशन परिवार की विरासत है। इस विरासत की शुरुआत 1882 में हुई जब ए.पी. बजाज जी ने लाहौर में प्रेस की स्थापना की। भारत के विभाजन के बाद यह प्रेस दिल्ली में स्थापित हुआ और धीरे-धीरे एक बड़े मीडिया समूह में बदल गया। इसके बाद इस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली पी. के. बाजाज ने।
उन्होंने 1964 में इस पारिवारिक व्यवसाय से जुड़कर प्रकाशन की दुनिया में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की और आने वाले दशकों में इसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके नेतृत्व में लोटपोट और मायापुरी दोनों ही पत्रिकाएँ घर-घर में पहचानी जाने लगीं।
मायापुरी – बॉलीवुड पत्रकारिता का प्रतिष्ठित नाम
जहाँ लोटपोट बच्चों की दुनिया थी, वहीं मायापुरी भारतीय फिल्म पत्रकारिता का एक बड़ा स्तंभ बन गई। 1970 के दशक में शुरू हुई यह पत्रिका जल्द ही हिंदी फिल्म उद्योग की सबसे लोकप्रिय पत्रिकाओं में शामिल हो गई। आज भी यह भारत की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली फिल्म पत्रिकाओं में गिनी जाती है।

फिल्मी दुनिया की खबरें, सितारों के इंटरव्यू, पर्दे के पीछे की कहानियाँ, इन सबके जरिए मायापुरी ने फिल्म प्रेमियों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई। इसी वजह से बॉलीवुड के कई बड़े सितारों से पी. के. बाजाज के गहरे संबंध थे। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें सम्मान और स्नेह के साथ याद किया जाता था।
बच्चों के प्रति उनका विशेष प्रेम
पी. के. बाजाज की सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उन्हें बच्चों से बेहद प्रेम था। वे हमेशा मानते थे कि बच्चों को ऐसी कहानियाँ मिलनी चाहिए जो उन्हें हँसाएँ, सोचने पर मजबूर करें और अच्छे मूल्यों से परिचित कराएँ। यही कारण है कि लोटपोट में हमेशा मनोरंजन के साथ-साथ सीख भी होती थी। उनकी इसी सोच के कारण लोटपोट दशकों तक बच्चों के बीच लोकप्रिय बना रहा।
लोटपोट के किरदार केवल पत्रिका तक सीमित नहीं रहे। मोटू-पतलू जैसे पात्र बाद में टीवी और एनीमेशन की दुनिया में भी बेहद लोकप्रिय हुए और बच्चों के सबसे पसंदीदा शो में शामिल हो गए।
इस तरह एक कॉमिक्स बाल पत्रिका से शुरू हुई कहानी टेलीविजन, डिजिटल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँच गई, जो पी. के. बाजाज की दूरदर्शिता का ही परिणाम था।
जब कई बाल पत्रिकाएँ बंद हो गईं…
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो महसूस होता है कि भारत की कई प्रसिद्ध बाल पत्रिकाएँ समय के साथ बंद हो गईं। लेकिन इन सबके बीच लोटपोट आज भी प्रकाशित हो रही है। यह केवल एक पत्रिका का जीवित रहना नहीं है, यह एक विरासत का जीवित रहना है।
पी. के. बाजाज ने समय के साथ बदलती दुनिया को समझते हुए Lotpot 2.0 जैसे प्रयास भी किए ताकि नई पीढ़ी भी इस पत्रिका से जुड़ी रहे।
एक संपादक नहीं, एक युग
अगर हम ईमानदारी से कहें तो पी. के. बाजाज केवल संपादक नहीं थे।
वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने
- बच्चों की हँसी को शब्द दिए
- कॉमिक्स को पहचान दी
- और भारतीय फिल्म पत्रकारिता को नई दिशा दी।
लोटपोट और मायापुरी के पीछे उनकी दृष्टि और समर्पण ही वह शक्ति थी जिसने इन प्रकाशनों को दशकों तक जीवित रखा। आज कॉमिक्स बाइट और पूरे भारतीय कॉमिक्स समुदाय की ओर से हम इस महान व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आपने जो दुनिया रची वह केवल कागज़ के पन्नों पर नहीं थी। वह लाखों बच्चों की हँसी में, उनके बचपन की यादों में और भारतीय कॉमिक्स संस्कृति में हमेशा जीवित रहेगी।
आपको और आपके परिवार के प्रयासों को शत-शत नमन। काॅमिक्स बाइट!!



