नंदन बाल पत्रिका: भारतीय बचपन की सांस्कृतिक विरासत और संस्कारों की पाठशाला
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एक ऐसा दौर, जब हर महीने आने वाली एक पत्रिका बच्चों को कहानियाँ सुनाने के साथ-साथ उन्हें बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनना भी सिखाती थी।
आज के डिजिटल युग में बच्चों का बचपन तेजी से बदल रहा है। मोबाइल स्क्रीन, छोटे वीडियो, ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया के बीच बच्चों का खाली समय अब पहले जैसा नहीं रहा। मनोरंजन के अनगिनत विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इस भीड़ में एक सवाल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि क्या आज के बच्चों को ऐसा साहित्य मिल रहा है, जो उनका मनोरंजन करने के साथ-साथ उनकी कल्पनाशक्ति, भाषा, सोच और व्यक्तित्व का भी विकास करे?
90 के दशक में बड़े हुए लोगों से अगर यह सवाल पूछा जाए, तो शायद उन्हें इस सवाल का जवाब तलाशने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। उनके बचपन का एक खूबसूरत हिस्सा ऐसी ही एक पत्रिका के पन्नों में छिपा हुआ है, जिसका नाम था ‘नंदन’ (Nandan)।

हिंदुस्तान टाइम्स समूह की इस प्रतिष्ठित हिंदी बाल पत्रिका का पहला अंक नवंबर 1964 में प्रकाशित हुआ था। नंदन केवल बच्चों के मनोरंजन के लिए शुरू की गई कोई सामान्य पत्रिका नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक सांस्कृतिक और शैक्षिक दृष्टिकोण था। इसकी शुरुआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की उस सोच से प्रेरित थी, जिसमें बच्चों को देश का भविष्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण नींव माना गया था।
नेहरू का मानना था कि बच्चों को बेहतर शिक्षा, स्वतंत्र चिंतन और रचनात्मक वातावरण मिलना चाहिए। नंदन ने इसी विचार को साहित्य, चित्रकथाओं, पहेलियों, ज्ञानवर्धक सामग्री और प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से अपने पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
पांच दशकों से भी अधिक समय तक नंदन ने भारतीय बच्चों की कई पीढ़ियों के साथ अपना रिश्ता बनाए रखा। यह पत्रिका कभी केवल कहानियों का संग्रह नहीं रही। इसके पन्नों में मनोरंजन था, ज्ञान था, भाषा की मिठास थी, इतिहास था और जीवन को बेहतर ढंग से समझने की छोटी-छोटी सीख भी थी।
आज जब हम पुराने अंकों को पलटते हैं, तो हमें केवल बीते हुए समय की याद नहीं आती, बल्कि उस दौर की एक ऐसी सांस्कृतिक दुनिया दिखाई देती है, जिसने लाखों बच्चों के बचपन को आकार दिया था।
नंदन की संपादकीय दुनिया: मनोरंजन, ज्ञान और कल्पनाशक्ति का अनूठा संगम
नंदन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसका संतुलित संपादकीय स्वरूप था। उस समय बच्चों के लिए प्रकाशित होने वाली कई पत्रिकाएँ मुख्य रूप से चित्रकथाओं अथवा कहानियों पर केंद्रित होती थीं, लेकिन नंदन ने अपने पन्नों पर साहित्य, मनोरंजन, सामान्य ज्ञान, हास्य और बौद्धिक गतिविधियों को एक साथ स्थान दिया।
इसका हर अंक अपने आप में एक छोटी सी दुनिया होता था। पाठक एक पन्ने पर कोई रोचक कहानी पढ़ सकता था, दूसरे पन्ने पर चित्रकथा का आनंद ले सकता था और अगले ही पन्ने पर किसी पहेली को हल करने में व्यस्त हो सकता था।
यही विविधता नंदन को एक विशिष्ट बाल पत्रिका बनाती थी। हर एक पाठक वर्ग के लिए इस बाल पत्रिका में कुछ ना कुछ मनोरंजन जरूर था।
1. कहानियाँ: कल्पनाओं और जीवन मूल्यों की दुनिया
नंदन के नियमित आकर्षणों में कहानियों का महत्वपूर्ण स्थान था। भारतीय लोककथाओं, पौराणिक प्रसंगों, ऐतिहासिक घटनाओं और समकालीन जीवन पर आधारित कहानियाँ बच्चों को एक विस्तृत साहित्यिक संसार से परिचित कराती थीं।
इन कहानियों की खूबसूरती यह थी कि वे बच्चों को उपदेश देने के बजाय घटनाओं और पात्रों के माध्यम से जीवन की महत्वपूर्ण बातें समझाती थीं।
ईमानदारी, साहस, करुणा, मित्रता, परिश्रम और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता जैसे मूल्य इन कहानियों का स्वाभाविक हिस्सा होते थे।
बंगाली साहित्य की समृद्ध परंपरा से जुड़े विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय जैसे साहित्यकारों की रचनाओं और अन्य प्रतिष्ठित लेखकों के साहित्यिक योगदान ने बाल साहित्य की इस दुनिया को और समृद्ध बनाया।
इन कहानियों को पढ़ते हुए बच्चों की कल्पनाशक्ति विकसित होती थी। वे अलग-अलग समाजों, संस्कृतियों और परिस्थितियों से परिचित होते थे। उनके सामने ऐसी दुनिया खुलती थी, जो उनके आसपास के सीमित अनुभवों से कहीं बड़ी थी। कई बार तो इन्हें विशेषांक के स्वरूप में प्रकाशित किया जाता,जैसे परीकथा विशेषांक या चित्रकथा विशेषांक।
2. चित्रकथाएँ: जब शब्दों के साथ चित्र भी कहानी सुनाते थे
बच्चों के लिए चित्रों का आकर्षण हमेशा से विशेष रहा है। नंदन ने इस बात को बखूबी समझा और अपनी पत्रिका में चित्रकथाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया।
‘चित्रकथाएँ’ केवल मनोरंजन का साधन नहीं थीं, बल्कि वे बच्चों को कहानी पढ़ने और समझने का एक अलग अनुभव प्रदान करती थीं।
‘तेनालीराम’ जैसी धारावाहिक चित्रकथाओं ने पाठकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। इनके माध्यम से बच्चों को पात्रों, घटनाओं और चित्रों के जरिए कहानी की दुनिया में प्रवेश करने का अवसर मिलता था।
चित्रों के साथ आगे बढ़ती कहानी बच्चों की पढ़ने की रुचि को बनाए रखती थी। साथ ही, संवादों और चित्रों के संयोजन से वे घटनाओं को समझना और अपनी कल्पना में उन्हें जीवंत करना सीखते थे।
यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाल साहित्य में चित्र केवल सजावट नहीं होते। वे कहानी की भाषा का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।
3. पहेलियाँ और दिमागी कसरत: खेल-खेल में सीखने का आनंद
नंदन के नियमित स्तंभों और गतिविधियों में पहेलियों का अपना विशेष आकर्षण था।
‘खेल पहेली’, ‘ज्ञान-पहेली’ और ‘आप कितने बुद्धिमान हैं?’ जैसे स्तंभ बच्चों को केवल पढ़ने तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से सोचने और सवालों के जवाब तलाशने के लिए प्रेरित करते थे।
इन पहेलियों में कहीं सामान्य ज्ञान की परीक्षा होती थी, कहीं तार्किक क्षमता की और कहीं शब्दों तथा संख्याओं के साथ खेलने का अवसर मिलता था।
आज की भाषा में कहें तो यह बच्चों के लिए एक प्रकार का मानसिक व्यायाम था।
इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों को किसी समस्या को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने, संभावित उत्तरों पर विचार करने और अपनी समझ का इस्तेमाल करने का अवसर देती थीं।
सबसे अच्छी बात यह थी कि सीखने की यह प्रक्रिया किसी कक्षा या परीक्षा जैसी महसूस नहीं होती थी। बच्चों के लिए यह मनोरंजन था और उसी मनोरंजन के भीतर सीखने का अवसर भी छिपा हुआ था।
4. चटपट: छोटी-छोटी बातों में मनोरंजन और ज्ञान
नंदन के आकर्षक स्तंभों में ‘चटपट’ जैसी सामग्री भी शामिल थी, जिसमें छोटे-छोटे रोचक प्रसंग, हास्य, जानकारी और मनोरंजक सामग्री पढ़ने को मिलती थी।
चाहे वह ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से जुड़ी कोई दिलचस्प घटना हो, तेनालीराम की बुद्धिमत्ता से जुड़ा प्रसंग हो अथवा चीटू-नीटू जैसे पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत मनोरंजन, ऐसी सामग्री पत्रिका को हर उम्र के बाल पाठक के लिए रोचक बनाए रखती थी।
इसका संपादकीय महत्व भी कम नहीं था। हर सामग्री को लंबा और गंभीर बनाने के बजाय छोटी-छोटी रचनाओं के माध्यम से बच्चों का ध्यान बनाए रखना नंदन की प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण पहलू था।
चीटू-नीटू: नंदन के लोकप्रिय किरदार, जिनसे जुड़ी थीं बचपन की यादें
नंदन की लोकप्रियता में उसके मनोरंजक पात्रों का भी महत्वपूर्ण योगदान था। ऐसे ही चर्चित नामों में चीटू-नीटू का नाम विशेष रूप से याद किया जाता है।

बच्चों की पत्रिकाओं में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो अपनी कहानियों और शरारतों के जरिए पाठकों के बीच अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। चीटू-नीटू भी ऐसे ही लोकप्रिय पात्रों में शामिल थे। उनकी मौजूदगी ने नंदन की दुनिया को और जीवंत बनाया। बच्चों के लिए ये किरदार केवल पढ़ने की सामग्री नहीं थे, बल्कि पत्रिका के साथ विकसित होने वाले एक परिचित रिश्ते का हिस्सा थे।
नंदन के पुराने अंकों को याद करने वाले पाठकों के लिए चीटू-नीटू का जिक्र उस दौर की बाल पत्रिका संस्कृति की यादें ताजा कर सकता है। यही किसी लोकप्रिय बाल-पात्र की असली उपलब्धि होती है कि प्रकाशन के वर्षों बाद भी पाठक उसे याद रखें।
नंदन की कहानियों, पहेलियों और चित्रकथाओं के बीच ऐसे पात्रों ने पत्रिका को एक अलग पहचान देने में योगदान दिया।
नंदन और राष्ट्र निर्माण की सोच: बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास
अगर नंदन को केवल कहानियों और चित्रकथाओं के आधार पर समझा जाए, तो इसकी वास्तविक संपादकीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा छूट जाएगा।
इस पत्रिका की विशेषता यह भी थी कि इसमें बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों को लेकर भी सामग्री प्रकाशित की जाती थी।

इसके विभिन्न अंकों में नैतिक मूल्यों, नागरिक कर्तव्यों, सामाजिक जिम्मेदारी, राष्ट्रीय एकता और देश के प्रति अपने दायित्वों से संबंधित सामग्री को स्थान दिया जाता था।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। नंदन बच्चों को केवल यह नहीं बताती थी कि अच्छा इंसान कैसे बनना है, बल्कि वह उन्हें यह समझाने का भी प्रयास करती थी कि एक अच्छे समाज और मजबूत राष्ट्र के निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका होती है।
जवाहरलाल नेहरू की बाल-दृष्टि और नंदन का वैचारिक आधार
नंदन की शुरुआत के पीछे पंडित जवाहरलाल नेहरू की बच्चों के प्रति सोच को एक महत्वपूर्ण प्रेरणा के रूप में देखा जाता है।
नेहरू बच्चों को केवल भविष्य के नागरिक के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए बच्चों का वर्तमान, उनकी शिक्षा, उनकी जिज्ञासा और उनके व्यक्तित्व का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण था।
उनका विश्वास था कि बच्चों को प्रश्न पूछने, नई चीजें सीखने और स्वतंत्र रूप से सोचने का अवसर मिलना चाहिए।
नंदन ने अपने साहित्यिक स्वरूप में इस व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। पत्रिका के माध्यम से बच्चों को इतिहास, संस्कृति, समाज और देश की विविधता से परिचित कराया गया।
स्वामी विवेकानंद के विचार और चरित्र निर्माण का महत्व
भारतीय चिंतन परंपरा में स्वामी विवेकानंद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण केवल जानकारी प्राप्त करने तक सीमित नहीं था। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे, जो व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास, चरित्र, आत्मनिर्भरता और सेवा की भावना विकसित करे।
विवेकानंद के विचारों में चरित्र निर्माण और मानव सेवा का विशेष महत्व था।

बाल साहित्य के संदर्भ में ऐसे विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। बच्चों को यदि छोटी उम्र से ही दूसरों के प्रति संवेदनशील होना, अपने कर्तव्यों को समझना और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यवहार करना सिखाया जाए, तो इसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर लंबे समय तक बना रह सकता है।
नंदन में प्रकाशित नैतिक और प्रेरक सामग्री को इसी व्यापक भारतीय मूल्य परंपरा के संदर्भ में समझा जा सकता है।
पर्यावरण की रक्षा, बड़ों का सम्मान, सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता जैसे विषय बच्चों को यह समझाने का माध्यम बनते थे कि नागरिकता केवल अधिकारों का विषय नहीं है। इसके साथ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं।
यही वह विचार था, जिसने नंदन को सामान्य मनोरंजन से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक और शैक्षिक पत्रिका का स्वरूप दिया।
90 के दशक का नंदन: जब पत्रिका के विज्ञापन भी यादों का हिस्सा बन गए
नब्बें के दशक में बड़े हुए पाठकों के लिए नंदन की यादें केवल कहानियों और पहेलियों तक सीमित नहीं हैं।
उस दौर की पत्रिकाओं को दोबारा पलटने पर उनके विज्ञापन भी उतने ही आकर्षक लगते हैं जितनी उनकी संपादकीय सामग्री।
आज विज्ञापन हमारे डिजिटल अनुभव का इतना सामान्य हिस्सा बन चुके हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान भी नहीं देते। लेकिन प्रिंट पत्रिकाओं के दौर में विज्ञापनों का अपना एक अलग दृश्य संसार हुआ करता था।
नंदन के पुराने अंकों में दिखाई देने वाले रंगीन विज्ञापन उस समय के भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों, बच्चों की पसंद और बदलती उपभोक्ता संस्कृति की झलक प्रस्तुत करते हैं।
रसभरे रासना पेय का विज्ञापन हो, पारले-जी के पैकेट पर दिखाई देने वाली परिचित बच्ची हो, क्रैक्स के कुरकुरे कॉर्न रिंग्स हों या नटराज की पेंसिल और कैमलिन के ज्योमेट्री बॉक्स जैसे स्टेशनरी उत्पाद, ये सभी उस दौर की यादों से जुड़े हुए हैं।
कई पाठकों के लिए ये विज्ञापन आज भी बचपन की एक परिचित तस्वीर सामने ले आते हैं।
इन विज्ञापनों का महत्व केवल ब्रांड पहचान तक सीमित नहीं था। वे उस समय के सामाजिक और आर्थिक बदलावों को भी दर्शाते थे।
1990 के दशक में उदारीकरण के बाद भारतीय बाजार तेजी से बदल रहा था। नए उत्पाद, नए ब्रांड और उपभोक्ताओं की बदलती पसंद भारतीय परिवारों के जीवन में अपनी जगह बना रहे थे।

बच्चों की पत्रिकाएँ भी इस बदलती दुनिया का हिस्सा थीं।
नंदन के पुराने विज्ञापनों को आज देखना इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि वे हमें उस समय की रोजमर्रा की जिंदगी, बाजार और लोकप्रिय संस्कृति का एक छोटा-सा दस्तावेज उपलब्ध कराते हैं।
यह एक ऐसा पहलू है, जिस पर भविष्य में भारतीय प्रिंट मीडिया और विज्ञापन इतिहास के संदर्भ में गंभीरता से चर्चा की जा सकती है।
जयप्रकाश भारती और नंदन की संपादकीय विरासत
किसी भी प्रतिष्ठित पत्रिका की पहचान केवल उसकी सामग्री से नहीं बनती, बल्कि उसके पीछे काम करने वाले संपादकों, लेखकों, चित्रकारों और पूरी संपादकीय टीम के योगदान से बनती है।
नंदन की चर्चा में जयप्रकाश भारती का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने पत्रिका के संपादकीय इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाल साहित्य तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनके साथ जुड़े लेखकों और चित्रकारों ने नंदन की साहित्यिक तथा दृश्यात्मक दुनिया को आकार देने में योगदान दिया।
एम. एस. अग्रवाल जैसे कलाकारों का नाम भी इस संदर्भ में याद किया जाता है। किसी बाल पत्रिका में चित्रों का महत्व कितना अधिक होता है, इसे समझने के लिए नंदन के पुराने अंकों को देखना ही पर्याप्त है।
कहानी का शीर्षक, चित्रों की प्रस्तुति, पात्रों की अभिव्यक्ति और पन्नों का संयोजन, ये सभी चीजें मिलकर बच्चों के पढ़ने के अनुभव को खास बनाती थीं।
नंदन की यह विरासत केवल किसी एक संपादक अथवा कलाकार की उपलब्धि नहीं थी। यह उन तमाम रचनाकारों का सामूहिक योगदान था, जिन्होंने बच्चों के लिए साहित्य को गंभीरता और रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया।
आज भी कहाँ मिल सकती है नंदन की दुनिया?
पुराने हिंदी साहित्य, बाल पत्रिकाओं और 90 के दशक की प्रिंट संस्कृति में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए नंदन के पुराने अंकों को तलाशना आज भी एक दिलचस्प अनुभव हो सकता है।
डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध कुछ पुराने अंक और संग्रह इस विरासत को समझने का अवसर देते हैं।
नंदन से संबंधित सामग्री तलाशने के लिए कुछ उपयोगी स्रोत:
- अमेजन इंडिया: नंदन से संबंधित पुस्तकों और उपलब्ध संग्रहों की तलाश की जा सकती है।
- मैग्ज़टर: नंदन के डिजिटल अंकों और उपलब्ध संग्रहों के लिए।
- इंटरनेट आर्काइव: पुराने अंकों और डिजिटल अभिलेखों की तलाश के लिए।
इन डिजिटल संग्रहों का महत्व केवल पुरानी पत्रिका पढ़ने तक सीमित नहीं है। ये आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय बाल साहित्य और प्रिंट संस्कृति को समझने का एक माध्यम भी बन सकते हैं।
क्या आज के बच्चों को नंदन जैसी पत्रिकाओं की जरूरत है?
यह सवाल शायद इस पूरे लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आज बच्चों के पास मनोरंजन के विकल्पों की कमी नहीं है। वे मोबाइल पर कार्टून देख सकते हैं, वीडियो गेम खेल सकते हैं, ऑनलाइन कहानियाँ सुन सकते हैं और कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी हिस्से की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन सूचना की उपलब्धता और ज्ञान के विकास के बीच एक अंतर होता है।
किसी बच्चे को लगातार नई जानकारियाँ मिलना और उसका उन जानकारियों को समझना, उन पर विचार करना तथा उनसे अपनी सोच विकसित करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

यहीं पर नंदन जैसी पत्रिकाओं की उपयोगिता समझ आती है।
एक पत्रिका को पढ़ने के लिए बच्चे को समय देना पड़ता था। उसे कहानी के पात्रों को समझना होता था, घटनाओं को जोड़ना होता था और किसी पहेली का उत्तर तलाशने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल करना होता था।
यह एक ऐसा अनुभव था, जिसमें पढ़ने की गति बच्चे के हाथ में होती थी।
वह किसी पन्ने पर रुक सकता था, चित्रों को ध्यान से देख सकता था, किसी कहानी को दोबारा पढ़ सकता था और अपनी पसंद के हिस्से को बार-बार पलट सकता था।
इस तरह का पढ़ने का अनुभव बच्चों में धैर्य, एकाग्रता, भाषा की समझ और कल्पनाशक्ति विकसित करने में सहायक हो सकता है।
आज जब छोटे वीडियो और तेजी से बदलती डिजिटल सामग्री बच्चों के स्क्रीन टाइम का बड़ा हिस्सा बन रहे हैं, तब पुस्तकों और पत्रिकाओं के लिए जगह बनाए रखना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि डिजिटल माध्यम गलत हैं अथवा बच्चों को उनसे दूर रखा जाना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि मनोरंजन और शिक्षा के बीच संतुलन बनाया जाए।
बच्चों को तकनीक के साथ-साथ किताबों से भी जुड़ने का अवसर मिले। उन्हें ऐसी कहानियाँ पढ़ने को मिलें, जो उनकी जिज्ञासा को बढ़ाएँ। ऐसी पहेलियाँ मिलें, जो उन्हें सोचने पर मजबूर करें। ऐसा साहित्य मिले, जो उन्हें अपनी भाषा, इतिहास और संस्कृति से जोड़ सके।
नंदन की विरासत हमें इसी संतुलन की याद दिलाती है।
नंदन: एक पीढ़ी की यादों से कहीं बढ़कर
किसी पत्रिका की वास्तविक सफलता केवल उसके प्रकाशित अंकों की संख्या अथवा उसकी प्रसार संख्या से नहीं मापी जा सकती।
उसकी सफलता इस बात में भी छिपी होती है कि उसने अपने पाठकों के जीवन में कितनी जगह बनाई।
नंदन के मामले में यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
आज भी जब 70, 80 और 90 के दशक में बड़े हुए लोग अपने बचपन की पत्रिकाओं का जिक्र करते हैं, तो नंदन का नाम उन यादों में शामिल होता है।
किसी को उसके कहानी वाले पन्ने याद आते हैं, किसी को पहेलियाँ, किसी को चित्रकथाएँ और किसी को पत्रिका के बीच में छपे वे विज्ञापन, जो उस समय के बचपन का हिस्सा हुआ करते थे।
लेकिन इन सभी यादों के पीछे एक बड़ा विचार मौजूद है।
वह विचार यह था कि बच्चों का मनोरंजन भी सार्थक हो सकता है। साहित्य केवल परीक्षा पास करने अथवा भाषा सीखने का माध्यम नहीं है। वह बच्चों को दुनिया समझने, दूसरों के अनुभवों से जुड़ने और अपने भीतर एक बेहतर व्यक्तित्व विकसित करने का अवसर दे सकता है।
नंदन ने अपने लंबे प्रकाशन इतिहास में इसी विचार को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
आज भले ही उसका वह पुराना प्रिंट स्वरूप हमारे बीच पहले की तरह सक्रिय न हो, लेकिन उसकी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को संरक्षित करना जरूरी है।
क्योंकि कुछ पत्रिकाएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे अपने पाठकों के व्यक्तित्व और यादों का हिस्सा बन जाती हैं।
नंदन भी ऐसी ही एक पत्रिका थी।
यह भारतीय बचपन का एक ऐसा अध्याय है, जिसे केवल पुरानी यादों के नाम पर नहीं, बल्कि भारतीय बाल साहित्य की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत के रूप में याद किया जाना चाहिए। आभार – काॅमिक्स बाइट!!


