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इत्तेफाक (1969): मर्डर मिस्ट्री, शानदार कहानी और राजेश खन्ना की दमदार एक्टिंग वाली मस्ट वाॅच फिल्म! (Ittefaq (1969): A Must-Watch Murder Mystery with Brilliant Storytelling and Fantabulous Performances.)

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इत्तेफाक सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि शानदार कहानी, बेहतरीन अभिनय और पुराने सिनेमा के जादू का अनुभव है। (Ittefaq is not just a thriller; it’s a perfect blend of suspense, memorable performances and old-school cinematic magic.)

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनके बारे में लोग बहुत कम बात करते हैं, लेकिन जब आप उन्हें देखते हैं तो पहला सवाल यही आता है – “आखिर इसके बारे में ज्यादा बातें क्यों नहीं होतीं?”

मेरे साथ यही हुआ इत्तेफाक (1969) के साथ।

कई बार पुरानी फिल्में देखने बैठते हैं तो लगता है कि शायद अब उनका जादू काम नहीं करेगा। लेकिन कल रात जब मैंने इत्तेफाक देखी, तो पहले कुछ मिनटों के बाद ही मैं पूरी तरह फिल्म से जुड़ गया। शुरुआत से ही फिल्म आपको कोई राहत नहीं देती। एक घटना होती है, फिर दूसरी, और हर कुछ देर में कहानी आपको ऐसा महसूस करवाती है कि अब रहस्य समझ आ गया है लेकिन अगले ही पल एक नया मोड़ सामने खड़ा होता है।

Ittefaq (1969) - Movie Review
Ittefaq (1969) – Movie Review

फिल्म की कहानी दिलीप रॉय के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार राजेश खन्ना ने निभाया है। उन पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है। उन्हें मानसिक जांच के लिए अस्पताल भेजा जाता है, लेकिन वह वहां से भाग निकलते हैं। रात के अंधेरे में वह एक बंगले में पनाह लेते हैं, जहां उनकी मुलाकात रेखा यानी नंदा से होती है।

शुरुआत में रेखा डरी हुई दिखाई देती हैं। दर्शक भी यही सोचते हैं कि वह अब किसी तरह खुद को बचाने की कोशिश करेंगी। लेकिन धीरे-धीरे कहानी कुछ और ही रूप लेने लगती है। अचानक वही रेखा दिलीप का साथ देने लगती हैं। यहीं से फिल्म आपके दिमाग के साथ खेलना शुरू कर देती है।

  • क्या दिलीप सचमुच हत्यारा है?
  • क्या रेखा कुछ छिपा रही है?
  • क्या राजेश खन्ना ने अपनी पत्नी का खून किया था?
  • या फिर इस पूरी कहानी के पीछे कोई तीसरा खिलाड़ी मौजूद है?

इसी सवाल के साथ फिल्म आगे बढ़ती रहती है।

फिल्म में छोटे किरदार भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इफ्तेखार का इंस्पेक्टर कर्वे वाला रोल कहानी को मजबूत बनाता है। सुजीत कुमार इंस्पेक्टर दीवान के रूप में नजर आते हैं, और धीरे-धीरे उनके आसपास भी संदेह की परतें बनने लगती हैं। मदन पुरी, बिंदु, शम्मी और जगदीश राज जैसे सहायक कलाकार कहानी के ऐसे हिस्से लगते हैं जिनको हटाया नहीं जा सकता। वे सिर्फ स्क्रीन भरने के लिए नहीं थे, बल्कि हर व्यक्ति कहानी में शक की एक नई परत जोड़ता है।

Ittefaq (1969) - Movie Review

सबसे बड़ी बात यह है कि फिल्म में कोई गाना नहीं है। 1969 के दौर में यह बहुत बड़ा जोखिम था क्योंकि उस समय फिल्मों में कई गाने होना लगभग तय माना जाता था। लेकिन यश चोपड़ा ने यहां सिर्फ कहानी पर भरोसा किया और वही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन गई। यह फिल्म हॉलीवुड की “साईनपोस्ट टू मर्डर” से प्रेरित थी, लेकिन भारतीय अंदाज में इसे बहुत खूबसूरती से ढाला गया।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि फिल्म आपको जल्दी जवाब देने की कोशिश नहीं करती। आज की कई फिल्में दस मिनट में आपको बता देती हैं कि किसे प्यार करना है, किस पर शक करना है और आखिर में कौन खलनायक निकलेगा। लेकिन इत्तेफाक आपके साथ बैठकर खेलती है। वह आपकी सोच के साथ खेलती है।

1969 में रिलीज़ हुई “इत्तेफाक” सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि सस्पेंस का ऐसा सफर है जिसमें न गाने हैं, न फालतू मसाला, लेकिन फिर भी कहानी आपको शुरुआत से अंत तक बांधे रखती है। राजेश खन्ना और नंदा की शानदार अदाकारी इस क्लासिक को आज भी खास बनाती है!”

मुझे एक और चीज़ बहुत पसंद आई और वो है युवा राजेश खन्ना का स्क्रीन प्रेजेंस। आज के समय में शायद अधिकांश कलाकार एक जैसे लगते हैं। लेकिन पुराने कलाकारों की अपनी पहचान थी। चाहे शशि कपूर हों, धर्मेंद्र हों, जितेंद्र हों या अमिताभ बच्चन, हर व्यक्ति/कलाकार का अपना अलग अंदाज़ था। राजेश खन्ना की मुस्कान, उनके हावभाव, उनकी आंखों की बेचैनी, यह सब कुछ अलग दिखाई देता है।

आज फिल्मों या कहूँ पूरी दुनिया में एक तरह की यूनिफॉर्मिटी दिखाई देती है। लेकिन पुराने समय में कुछ छोटी-छोटी कमियां, कुछ असमानताएं, कुछ “इनएक्यूरसी” थीं जो चीजों को ज्यादा जीवंत बनाती थीं। पुराने घर, पुरानी कारें, पुराने संवाद, लोगों के व्यवहार और हावभाव यही सब चीजें उन्हें असली बनाती थीं।

मुझे घर पर भी इस फिल्म को लेकर एक दिलचस्प बात पता चली। माताजी ने फिल्म देखकर बताया कि यह मेरे पिताजी की यह पसंदीदा फिल्मों में से एक थी। और जब इफ्तेखार के किरदार की बात हुई तो घर में यही सुनने को मिला कि उस दौर में उनका पुलिस ऑफिसर वाला अंदाज काफी लोकप्रिय हुआ था जो शायद आगे जाकर उन्हें स्टीरियोटाॅईप भी कर गया। यह बात सुनने के बाद फिल्म देखते समय मैं उन्हें अलग नजर से देख रहा था।

Ittefaq (1969) - Movie Review
Ittefaq (1969) – Movie Review

अगर आप सिर्फ तेज एक्शन या सीजीआई वाले सिनेमा के आदी हो चुके हैं तो इत्तेफाक आपको यह भान दिला सकती है कि सिर्फ कहानी और अभिनय के दम पर भी दर्शक को बांधा जा सकता है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐½ / 5

अगर आपने अभी तक यह फिल्म नहीं देखी है, तो एक रात निकालिए और इसे देखिए। हो सकता है फिल्म खत्म होने के बाद आप भी सोचें कि लोग इस फिल्म की बात इतनी कम क्यों करते हैं? आभार – काॅमिक्स बाइट!!

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