डायमंड कॉमिक्स: स्टिकर्स और नॉवेल्टीज़ का सुनहरा युग! (Diamond Comics Novelties: The Golden Era of Stickers & Freebies!)
डायमंड कॉमिक्स की नॉवेल्टी: जब स्टिकर ही बचपन की पहचान थे! (Diamond Comics Novelties: When stickers were the hallmark of childhood!)
एक सुनहरा दौर था…
जब बच्चों के लिए गर्मियों की छुट्टियाँ केवल आराम का नहीं, बल्कि खुशियों और रोमांच से भरे दिनों का प्रतीक होती थीं। सुबह-सुबह मैदान में क्रिकेट खेलना, दोपहर को ‘व्यापारी’ जैसे बोर्ड गेम में खो जाना और शाम के समय क्लबों या घरों में कैरम और बैडमिंटन की प्रतियोगिता! यही तो था नब्बें के दशक का सच्चा सुख एवं इन सबके बीच एक और खास चीज़ थी जो हर बच्चे के दिल के बेहद करीब थी – “कॉमिक्स” (Comics)।

कॉमिक्स केवल कहानियाँ नहीं होती थीं, वे एक अनुभव होती थीं। और जब कॉमिक्स के साथ मिलती थी नॉवेल्टी, जैसे कि रंगीन स्टिकर, तब उन्हें खरीदने की ख़ुशी दोगुनी हो जाती थी। डायमंड कॉमिक्स उस समय का एक प्रमुख नाम था एवं हर छोटे-बड़े नगर में इसकी कॉमिक्स सरलता से उपलब्ध होती थीं। चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू, पिंकी, रमन और श्रीमतीजी जैसे इन सभी चरित्रों ने हमारे बचपन को जीवंत किया है। परंतु, डायमंड कॉमिक्स की एक विशेषता और थी जिसने बच्चों का ध्यान हमेशा खींचा, मुफ़्त मिलने वाली नॉवेल्टी वस्तुएँ, विशेषकर कॉमिक्स के साथ दिए जाने वाले मुफ़्त स्टिकर्स।
जिस कॉमिक में स्टिकर होता था, उसकी मांग स्वतः ही बढ़ जाती थी। दुकानदारों से साफ कहा जाता,
“वही कॉमिक दीजिए जिसमें स्टिकर हो!”
स्टिकर भी समय के साथ कई प्रकारों में आने लगे —
- साधारण कागज़ी स्टिकर
- चमकदार प्लास्टिक स्टिकर
- मैगनेट स्टिकर
- कटआउट स्टीकर
- स्टीकर टैटू
- कार्ड्स
- पॉप अप स्टीकर
कॉमिक्स के मुखपृष्ठ पर “इस कॉमिक्स के साथ आकर्षक स्टिकर बिलकुल मुफ़्त!” जैसे संदेश बड़े सुन्दर ढंग से लिखे होते, जो किसी भी पाठक का ध्यान तुरंत आकर्षित करते। यह एक सीधी और सरल विपणन रणनीति थी, परंतु अत्यंत प्रभावशाली। स्कूल के बस्तों से लेकर गृहणियों की फ्रिज/अलमारियों तक में इन्हें चास्पा देखा जा सकता था। कई लोग इन्हें स्कूटर एवं बाइक्स पर भी चिपका कर रखते थे। मार्केटिंग सबसे साधारण नियम यहाँ पर लागू होता था जो आज बाजारों से पूरी तरह नदारद हो गया है।

हाल ही में मेरे एक मित्र ने मुझे डायमंड कॉमिक्स के कुछ दुर्लभ और पुरानी नोवेल्टी स्टिकर भेजे। जैसे ही मैंने वह डाक पैकेट खोला, बचपन की ढेरों यादें आंखों के सामने घूम गईं। उन विशेष स्टिकरों की झलक पाने के लिए मैंने इस पर एक वीडियो अपने यूट्यूब चैनल पर साझा किया है। आप भी उसे अवश्य देखें और अपनी बचपन की यादें हमारे साथ टिप्पणी में साझा करें। आज के डिजिटल युग में जहां कॉमिक्स में ऐसी मुफ्त वस्तुएँ लगभग लुप्त हो चुकी हैं, यह अनुभव वाकई दिल को सुकून देने वाला है। कभी-कभी जीवन की व्यस्तता में ये छोटी-छोटी खुशियाँ ही मन को शांति देती हैं। आप भी अपनी यादें हमसे साझा करें, आभार – कॉमिक्स बाइट!!
मन की बात
पता नहीं क्यूँ, पर वर्तमान का दौर बड़ा ही मिलावटी लगता है, हर कार्य में बस व्यवसाय ही दिखाई पड़ता है, सभी बचे-खुचे पाठकों को हाशिये पर रख दिया गया है एवं हिंदी भाषा को लेकर जो स्तिथि दिखाई पड़ती है वो डरावनी है! सरकार द्वारा आज अगर इसे नियंत्रण में नहीं लिया गया तो यह भी शायद कुछ वर्षों तक और अपनी पहचान बचा पाए, वर्ना हिंदी कॉमिक्स का दायरा तो वैसे भी सिमट गया है, हालाँकि कुछ अच्छे प्रयास भी हो रहे हैं जिनमें ‘इंडियन कॉमिक्स एसोसिएशन’ जैसे संगठन शामिल है पर इस तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है। सभी पाठकों का सहयोग और प्रकाशनों का व्यवसाय से इतर कुछ अलग करना अति-महत्वपूर्ण बन पड़ा है। पाठक अपनी राय हमें अवश्य बताएं, नमस्कार!
