हनुमान अंश: यह फिल्म नहीं, बाबा नीब करौरी को अर्पित एक प्रार्थना है (Hanuman Ansh: Not Just a Film, But a Prayer Offered to Neem Karoli Baba)
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‘हनुमान अंश’ — बाबा नीब करौरी के जीवन और हनुमान भक्ति से जुड़ा एक ऐसा सिनेमाई अनुभव, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी मन में गूंजता रहता है। (Hanuman Ansh is an emotional cinematic experience inspired by the life of Neem Karoli Baba, his devotion to Lord Hanuman, and the timeless message of faith, service and devotion.)
कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर हम उनके बारे में बहुत कुछ लिखना चाहते हैं। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं जिनके बारे में लिखते समय लगता है कि शब्द ही कम पड़ रहे हैं।
‘हनुमान अंश’ मेरे लिए ऐसी ही फिल्म है।

कॉमिक्स बाइट पर हम कॉमिक्स और पॉप कल्चर के साथ-साथ उन फिल्मों की भी बात करते हैं जो हमें भीतर तक प्रभावित करती हैं। ‘हनुमान अंश’ देखने के बाद मेरे मन में सबसे पहला विचार यही आया कि इसे सामान्य फिल्म समीक्षा कहना शायद इसके साथ न्याय नहीं होगा।
यह एक अनुभव है।
और शायद इस अनुभव के पीछे मेरी अपनी एक छोटी-सी कहानी भी है।
जब कैंची धाम जाने का अवसर मिला
पिछले वर्ष अपनी माताजी के साथ नैनीताल जाने का अवसर मिला था। उसी यात्रा में कैंची धाम जाने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
वहाँ जाने की कोई बहुत बड़ी योजना पहले से नहीं थी। लेकिन कई बार जीवन में कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं जिनका महत्व वहाँ पहुँचने के बाद समझ आता है।

कैंची धाम में कुछ ऐसा है जिसे शब्दों में पूरी तरह समझाना मुश्किल है। वहाँ का वातावरण, शांति और लोगों की श्रद्धा अपने आप में एक अलग अनुभव है।
वहाँ से बाबा नीब करौरी की कुछ तस्वीरें भी लेकर आया था, जो आज भी मेरे घर में हैं।
चमत्कार कहिए, विश्वास कहिए या संयोग, इन चीजों की व्याख्या हर व्यक्ति अपने तरीके से करता है। लेकिन बाबा नीब करौरी और हनुमान जी से जुड़ी कथाओं ने वर्षों से असंख्य लोगों को आकर्षित किया है।
और शायद इसी कारण जब ‘हनुमान अंश’ का ट्रेलर देखा था, तो फिल्म में मेरी रुचि स्वाभाविक रूप से बढ़ गई थी।
फिर वही गलती की जो हम अक्सर करते हैं।
सोचा, अच्छी फिल्म लग रही है, बाद में देखेंगे।
“लेकिन बाद में लगा कि ऐसी फिल्मों के लिए यह सोच बदलनी चाहिए।“
थिएटर में देखने का महत्व
हम बड़े सितारों और बड़े बजट की फिल्मों के लिए आसानी से थिएटर पहुँच जाते हैं। लेकिन भारतीय संतों, हमारी आध्यात्मिक परंपराओं और हमारी आस्था से जुड़ी कहानियों पर बनी फिल्मों को अक्सर घर पर देखने के लिए छोड़ देते हैं।
‘हनुमान अंश’ देखने के बाद मुझे लगा कि यह रवैया बदलना चाहिए।
क्योंकि पर्दे पर ऐसी कहानी लाना आसान नहीं है।
इसके पीछे लेखक, निर्देशक, कलाकार, संगीतकार, तकनीकी कलाकार और पूरी रचनात्मक टीम का परिश्रम होता है।
और जब कोई छोटी फिल्म दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाती है, तो उसका सबसे बड़ा सहारा वही दर्शक होते हैं।
‘हनुमान अंश’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
हनुमान अंश: यह फिल्म नहीं, बाबा नीब करौरी को अर्पित एक प्रार्थना है।”
बाबा नीब करौरी की कहानी को पर्दे पर देखना
बाबा नीब करौरी के जीवन को फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण विषय है।
किसी संत का जीवन केवल घटनाओं का सिलसिला नहीं होता। उसमें आस्था होती है, अनुभव होते हैं, लोगों की व्यक्तिगत मान्यताएँ होती हैं और कई ऐसी बातें होती हैं जिन्हें शब्दों में बाँधना आसान नहीं होता।

मेरे मन में भी यही प्रश्न था कि फिल्म बाबा के जीवन को किस तरह प्रस्तुत करेगी। लेकिन फिल्म शुरू होने के बाद यह संशय धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
फिल्म आपको अपने वातावरण में खींच लेती है। कई दृश्यों में ऐसा लगता ही नहीं कि आप कोई सामान्य फिल्म देख रहे हैं। ऐसा अनुभव होता है जैसे किसी भजन संध्या में बैठे हों और कहानी संगीत, संवाद और घटनाओं के माध्यम से आपके सामने आगे बढ़ रही हो।
यही इसका सबसे सुंदर पक्ष है।
कलाकारों ने निभाई बड़ी जिम्मेदारी
बाबा के बाल्यकाल को निभाने वाले नन्हे कलाकार ने बहुत प्रभावशाली काम किया है। एक ऐसे व्यक्तित्व के बचपन को पर्दे पर प्रस्तुत करना, जिसके बारे में दर्शकों के मन में पहले से श्रद्धा हो, आसान नहीं है। लेकिन बाल कलाकार की सहजता कहानी को विश्वसनीय बनाती है।

इसके बाद जब कहानी बाबा के युवा जीवन की ओर बढ़ती है, तो शोभिनव सत्य अपने अभिनय से विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। उन्हें देखकर कई क्षणों में मन में सहज विचार आता है कि शायद बाबा अपने युवा दिनों में ऐसे ही दिखाई देते होंगे।
यह किसी कलाकार के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है कि वह अपने किरदार को केवल निभाए नहीं, बल्कि दर्शक को यह विश्वास भी दिला दे कि वह उसी व्यक्ति की कहानी देख रहा है।
अभिनेता चंदन आनंद ने डॉ. भोसले की भूमिका में अच्छा काम किया है। इनके अलावा फिल्म में दिखाई देने वाले दूसरे सहयोगी कलाकार भी अपने-अपने हिस्से को प्रभावी बनाते हैं।
यहाँ किसी एक कलाकार की चमक के बजाय पूरी टीम का सामूहिक योगदान दिखाई देता है।
संगीत जो फिल्म खत्म होने के बाद भी साथ रहता है
‘हनुमान अंश’ का संगीत फिल्म के अनुभव का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिल्म में भक्ति संगीत को केवल पृष्ठभूमि भर के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है। संगीत कहानी के भाव के साथ चलता है।
“सीता राम, सीता राम” का भजन बार-बार वातावरण में सुनाई देता है और धीरे-धीरे वह फिल्म का हिस्सा ही नहीं, बल्कि उसके भाव का हिस्सा बन जाता है।
शिव जी से जुड़ा पृष्ठभूमि संगीत भी कई दृश्यों में अद्भुत प्रभाव पैदा करता है। कुछ क्षण ऐसे हैं जब उसे सुनकर सचमुच रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
बुंदेली लोकगीतों का प्रयोग भी फिल्म को अपनी अलग पहचान देता है, बाबा के विवाह का प्रसंग और उसमें आने वाला “जब जिद पे आ गई पार्वती” जैसा लोकगीत वातावरण को बहुत खूबसूरती से रचता है।
वहीं “मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान” जैसे गीत भक्ति के रंग को और गहरा करते हैं। मेरे साथ तो यह हुआ कि फिल्म देखने के बाद भी ये गीत दिमाग में चलते रहे।
शायद अच्छे संगीत की यही पहचान है।
सीमित बजट, लेकिन बड़ा प्रभाव
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और तकनीकी प्रस्तुति भी सराहने योग्य है।
हाँ, कुछ स्थानों पर सीमित बजट का प्रभाव दिखाई देता है। लेकिन इसे देखते हुए फिल्म की टीम के प्रयास की प्रशंसा और बढ़ जाती है। क्योंकि लगभग दो करोड़ रुपये के बजट में बनी फिल्म से बहुत बड़ी दृश्यात्मक भव्यता की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा।
इसके बावजूद कई दृश्य प्रभाव पैदा करते हैं और फिल्म का वातावरण लगातार बना रहता है।
यहाँ पैसा नहीं, बल्कि भावना और कहानी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
बॉक्स ऑफिस पर एक अनपेक्षित कहानी या चमत्कार?
‘हनुमान अंश’ की कहानी केवल पर्दे पर ही दिलचस्प नहीं है। इसका बॉक्स ऑफिस सफर भी अपने आप में उल्लेखनीय है।
शुरुआत बहुत छोटी थी। पहले दिन फिल्म की कमाई बेहद कम रही। बड़े स्तर पर इसका प्रचार भी नहीं था और उस समय सिनेमाघरों में कई बड़ी फिल्में मौजूद थीं।
लेकिन धीरे-धीरे दर्शकों ने फिल्म को अपनाना शुरू किया। एक दर्शक दूसरे को बताने लगा। फिर सामाजिक माध्यमों पर चर्चा बढ़ी। शो बढ़ने लगे और फिल्म ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। यही वह जगह है जहाँ दर्शकों की शक्ति दिखाई देती है।

आज फिल्म जिस मुकाम पर पहुँच चुकी है, वह बताता है कि किसी फिल्म के लिए सबसे प्रभावी प्रचार कभी-कभी उसका अपना दर्शक ही होता है।
और ‘हनुमान अंश’ इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण बन गई है।
फिल्म से ज्यादा एक अनुभूति
फिल्म देखते समय कुछ ऐसे क्षण आते हैं जहाँ आप कहानी से अलग होकर सिर्फ उस वातावरण को महसूस करने लगते हैं। कहीं मुस्कुराहट आती है, कहीं रोंगटे खड़े होते हैं और आँखें नम बस बरबस ही हो जाती हैं।
मेरे लिए फिल्म का सबसे बड़ा प्रभाव यही रहा। मैं थिएटर से बाहर आने के बाद भी इसके संगीत और प्रसंगों के बारे में सोचता रहा। कैंची धाम की अपनी यात्रा याद आती रही। घर में रखी बाबा की तस्वीरें याद आईं।
और मन में यह विचार भी आया कि हम कई बार जिन चीजों को बाद के लिए टाल देते हैं, शायद उनका अनुभव उसी समय कर लेना चाहिए।
आस्था का अर्थ क्या है?
फिल्म को देखते हुए एक बात बार-बार मन में आती है – आस्था केवल दिखावे की चीज नहीं है।
सोशल मीडिया के इस दौर में किसी स्थान की लोकप्रियता बढ़ना बहुत आसान है। लोग तस्वीरें खींचते हैं, वीडियो बनाते हैं, अनुभव साझा करते हैं और देखते ही देखते कोई जगह चर्चा में आ जाती है।
लेकिन किसी स्थान की वास्तविक अनुभूति उसके बारे में बनी तस्वीरों और वीडियो से अलग होती है। इसलिए अगर आपको कभी अवसर मिले, तो कैंची धाम स्वयं जाकर देखिए।
किसी चलन का हिस्सा बनने के लिए नहीं।
किसी तस्वीर के लिए नहीं।
बस कुछ समय वहाँ बैठने के लिए।
शायद उस शांति में आपको अपने ही किसी प्रश्न का उत्तर मिल जाए।
क्या ‘हनुमान अंश’ देखनी चाहिए?
मेरी ओर से इसका उत्तर बिल्कुल हाँ है।
विशेष रूप से परिवार के साथ इसे थिएटर में देखने का अनुभव अच्छा रहेगा। और मैं इसे केवल उन लोगों के लिए नहीं कह रहा जो पहले से बाबा नीब करौरी या हनुमान जी में आस्था रखते हैं।
फिल्म का मूल भाव विश्वास, धैर्य, सेवा और कठिन परिस्थितियों में उम्मीद बनाए रखने से जुड़ा है।
इसलिए इसे एक खुले मन से देखिए।
शायद फिल्म आपको वही दे जिसकी आपने उससे अपेक्षा भी नहीं की थी।
यह समीक्षा नहीं, मेरा अनुभव है
मैंने शुरुआत में कहा था कि इसे सामान्य फिल्म समीक्षा कहना उचित नहीं होगा।
अब अंत में भी वही कहूँगा, मैं फिल्म को अंक नहीं देना चाहता। मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह दृश्य सबसे अच्छा था और वह दृश्य थोड़ा कमजोर।
क्योंकि मेरे लिए ‘हनुमान अंश’ का महत्व इस गणना से कहीं आगे है। यह फिल्म मेरे लिए उस यात्रा से जुड़ गई है जिसमें मैं अपनी माताजी के साथ कैंची धाम गया था।

उन तस्वीरों से जुड़ गई है जो आज भी मेरे घर में हैं। उन गीतों से जुड़ गई है जो फिल्म देखने के बाद भी मन में गूंजते रहे। और उन भावनाओं से जुड़ गई है जिन्हें शायद शब्दों में पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता।
इसलिए मैं इसे फिल्म से ज्यादा एक प्रार्थना कहना पसंद करूँगा। ऐसी प्रार्थना जिसे बाबा नीब करौरी के भक्तों ने अपने आराध्य को समर्पित किया है।
एक निवेदन
अगर आप अभी तक इस फिल्म को यह सोचकर टाल रहे हैं कि बाद में घर पर देख लेंगे, तो एक बार अपने फैसले पर जरूर विचार कीजिए।
थिएटर जाइए और परिवार के साथ बैठकर देखिए एवं खुद अनुभव कीजिए कि ‘हनुमान अंश’ आपको कैसी लगती है। क्योंकि ऐसी फिल्मों को दर्शकों का समर्थन मिलना जरूरी है।
उन कलाकारों के लिए जिन्होंने अपना समय दिया। उन तकनीकी कलाकारों के लिए जिन्होंने पर्दे के पीछे मेहनत की। और उस रचनात्मक टीम के लिए जिसने विश्वास किया कि बाबा नीब करौरी के जीवन की यह कथा बड़े पर्दे तक पहुँचनी चाहिए।
प्रभु श्रीराम को याद कीजिए।
हनुमान जी को मन से याद कीजिए।
श्रद्धा दिखावे की नहीं, हृदय की होनी चाहिए।
और शायद यही इस फिल्म का सबसे सुंदर संदेश भी है।
सीता राम।
सीता राम।
जय हनुमान। 🙏🏻 ‐ काॅमिक्स बाइट!!




